आखिर क्या होती है यह 'जिंदगी' ?
एक ऐसा मार्ग जिसके पथप्रदर्शक हम खुद हैं,
एक ऐसा समुद्र जिसमे उतार चढ़ाव आते रहते हैं,
एक ऐसी नाव जिसपर हर इंसान अकेला सवार है,
या फिर एक ऐसा सपना जिससे हर मनुष्य कतराता है ?

आखिर क्या होती है यह 'जिंदगी' ?
एक ऐसा आसमान जिसमे सांझ-उषा का आना जाना है,
एक ऐसा फूल जो एक न एक दिन मुरझा जाता है,
एक ऐसी नदी जिसे कोई रोक नहीं सकता,
या फिर एक अरसा, जो अनजाने में बीत जाता है ?

आखिर क्या होती है यह 'जिंदगी' ?
एक ऐसा पहाड़ जो हर मुश्किल में डटा रहता है,
एक हवा का झोंका जो बिना बोले मुड जाता है, 
एक ऐसा पत्थर जो हर कठिनाई चुपचाप सहता है,
या फिर एक ऐसा आँगन जहां सुख-दुःख की खेल मिचौनी चलती रहती है?

वास्तव में, जिंदगी एक पहेली है,
जो सुलझते  सुलझते इंसान को उलझा देती है,
और इसी वजह से कोई जान न पाया,
कि आखिर क्या होती है यह 'जिंदगी'|



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