सच है या सपना ?
3:41 PM | Author: Sherry Italia
माँ मधुर कंठ में गुनगुनाती,
प्यार से नन्हे को गोद में सुलाती,
कानों में गूंजती बचपन की लोरी,
चन्दा का पालना, रेशम की डोरी |

वोह पेहेंती थी तारों का माला,
पिलाती थी वोह ओस का प्याला,
परियां सजाती उसकी डोली,
कलियों सी कोमल उसकी बोली |

अंधेर की आँचल में लिपटी सदा,
छुईमुई सी शर्मीली उसकी अदा,
ख़्वाबों में बसाती थी शीशे से अरमान,
अचानक आया असलियत का फरमान  |

छन् से टूटा वोह सुन्दर सपना,
सितारों में नहीं मिला उसे अपना | 
क्या वोह सच्चाई से थी अनजान,
या चुराई थी उसने  एक नयी पहचान ?

अब नहीं रही बचपन की लोरी,
नहीं वोह पालना, नहीं वोह डोरी,
सांसें अब करती हैं भोर की आशा,
नहीं परवडती अब ख़्वाबों की भाषा |
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