वक़्त गिनती है साँसों की रफ़्तार
कहीं चंद लम्हें भी दास्ताँ कहलाती हैं
यादों की पंखुड़ियों में छिपे कुछ पल
पर अंत किसने देखा है ?

हम तै करते हैं नयी मंजिलें
कहीं राहें भी खो जाती हैं
कुछ कठिन कदम, कुछ दृढ इरादें
पर अंत किसने देखा है ?

सुखियन पलों में हंसी की किलकारी 
कहीं गम भी दस्तक दे जाते हैं
आंसुओं में छलकते जज्बातों की लड़ी
पर अंत किसने देखा है ?

सदा के लिए रहता नहीं है कोई 
कहीं मृत्यु भी समाधान होता है
ज़िन्दगी न अमर थी, न है
पर अंत किसने देखा है ?
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